दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में 7 सितंबर 2026 को एक ठेका कर्मचारी रंजीत गौतम की मौत हो गई। यह मौत स्वाभाविक नहीं थी। घटना के बाद सामने आई जानकारी दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन की कथित घोर लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रंजीत कुमार गौतम, उम्र 34 वर्ष, अपने परिवार के साथ श्रीराम जेजे कैम्प, नानकपुरा में रहते थे। वे मेसर्स एक्सीलेंट होम्स एंड गार्डेंस कम्पनी के तहत साउथ कैम्पस में माली के पद पर भर्ती थे। आरोप है कि पिछले 9 माह से कम्पनी माली के साथ-साथ इलेक्ट्रिक का भी काम रंजीत गौतम से करा रही थी। परिवार वालों का आरोप है कि इलेक्ट्रिक काम के दौरान रंजीत गौतम को करंट लगने से मौत हो गई।
बस्ती वालों ने बताया कि घटनास्थल पर बिजली मरम्मत के सामान और रंजीत के पैकेट से पेचकस मिला, जो इस बात के सबूत हैं कि घटना के समय रंजीत से इलेक्ट्रिक का काम कराया जा रहा था। यहां तक कि घटना के संबंध में न तो पुलिस को और न ही परिवार वालों को विश्वविद्यालय या कम्पनी की तरफ से सूचित किया गया। यह दिखाता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और कम्पनी की मिलीभगत ने घटना को जानबूझकर दबाने का प्रयास किया।
बस्ती वालों के मुताबिक रंजीत को करंट 4 बजे के आस-पास लगा था, लेकिन कर्मचारियों की छुट्टी होने के बाद (5 बजे के बाद) अस्पताल ‘चरक पालिका’, मोती बाग ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत घोषित कर दिया। 5.30 के आस-पास अस्पताल द्वारा फोन करके पुलिस को सूचित किया गया कि एक मृत व्यक्ति को लाया गया है, जिसकी करंट लगने से मृत्यु हो गई।
परिवार को रंजीत की मौत की जानकारी एक पड़ोसी से मिली, जब वह अपने बच्चे का इलाज कराने ‘चरक पालिका’ अस्पताल में गया था तब उसने रंजीत को मृत देखा उसके बाद बस्ती में फोन करके बताया। घटना की जानकारी मिलते ही बस्ती में कोहराम मच गया, जिसकी खबर पास में ही प्रदर्शन कर रहे छात्र संगठन ‘पछास’ और ‘इन्कलाबी मजदूर केन्द्र’ को पहुँचे।

जब ये घटना हुई मृतक के परिवार किसी परिजन की शोक में गई हुई थी। ‘पछास’ और ‘इन्कलाबी मजदूर केन्द्र’ और साउथ कैम्पस के छात्रों ने परिवार के रिश्तेदार के साथ मिलकर साउथ कैम्पस के उप निदेशक संजीव सिंह से रात में वार्ता की। इस वार्ता में परिवार का कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था और संजीव सिंह ने कोरा आश्वासन देकर जान छुड़ाने का काम किया।
जब सुबह के समय लोगों ने संजीव सिंह के दिए गए कोरे आश्वासन को समझा तो परिवार और बस्ती वालों के साथ मिलकर छात्र और संगठन साउथ कैम्पस निदेशक से बात करने के लिए गए। निदेशक ऑफिस के बाहर मृतक के परिवार वाले रो-बिलख रहे थे, लेकिन तीन घंटे से अधिक समय तक उनसे मिलने कोई नहीं आया। सिक्योरिटी ऑफिसर ने आकर कहा कि बात हो चुकी है तो दोबारा क्यों आए हो और निदेशक दफ्तर और साउथ कैम्पस का मेन गेट बंद कर दिया।
गर्मी में रोते-बिलखते परिवार वालों के लिए पानी बाहर से खरीदकर लाना पड़ा जबकी वहीं पर विश्वविद्यालय प्रशासन पुलिस वालों को चाय, बिस्कुट, समोसा खिला रहे थे। लगातार घंटों नारेबाजी और लोगों की संख्या बल के सामने विश्वविद्यालय प्रशासन 6 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत करने के लिए राजी हुआ।
एसएचओ, एसीपी के साथ उप-निदेशक और उप-रजिस्ट्रार, सिक्योरिटी ऑफिसर तथा एक अन्य पदाधिकारी के साथ वार्ता में शामिल हुए। जहां पर उप-रजिस्ट्रार द्वारा बड़े-बड़े मानवीय पक्ष रखे गए। रोते-बिलखते परिवार को पानी नहीं पिलाने वाले लोगों के मुंह से मानवीय पक्ष की बात सुनकर आश्चर्यचकित हो रहा था।
परिवार के मुआवजे और नौकरी देने पर यही कहना था कि हम इस डिमांड को आगे बढ़ा सकते हैं। यहां तक कि रंजित द्वारा इलेक्ट्रिशियन का काम कराए जाने पर कहना था कि कुछ लोग अतिरिक्त पैसे के लिए अन्य काम भी करते हैं! परिवार को जानकारी नहीं देने पर भी उनकी चुप्पी थी।
प्रशासन परिवार के एक सदस्य को ठेकेदारी पर रखने को तैयार था। दाह संस्कार के लिए सिर्फ एम्बुलेंस देने की बात कही जा रही थी। करीब एक घंटे भर की वार्ता में विश्वविद्यालय प्रशासन गोल-गोल घुमाता रहा और डिमांड लेटर की रिसीविंग दी, वह भी बिना मोहर के। बोले, दफ्तर बंद हो गया है तो मोहर नहीं लग सकती।
वार्ता रूम से बाहर निकलते ही छात्रों और परिवारजनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को घेर लिया और इस तरह के रवैये पर नाखुशी जाहिर करते हुए छात्रों ने आधे घंटे तक उप-रजिस्ट्रार से सवाल-जवाब किया। विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों के सामने झुकते हुए विश्वविद्यालय लेटर पैड पर मोहर और हस्ताक्षर के साथ डिमांड लेटर की रिसीविंग देनी पड़ी और लिखित देना पड़ा कि हम इस मांग को पूरा कराने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे।

परिवार वालों ने कर्मचारियों से जबरन ठेकेदार द्वारा पैसा लेने का मामला भी उठाया, जहां पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनभिज्ञता जताई। रंजीत की बहन ने बताया कि रंजीत से 3000 रुपये मांगे जा रहे थे, जिसको लेकर वह दबाव में था, क्योंकि पहले से उसकी कमाई से परिवार को चलाना मुश्किल हो रहा था।
पुलिस ने एफआईआर संख्या 154/26 में बीएनएस की धारा 287 (मशीनरी या बिजली के उपकरण के संबंध में लापरवाही बरतना) और 106 (1) (लापरवाही से मौत का कारण) जैसी हल्की धाराएं जोड़कर पीड़ित को ही लापरवाह बताने की कोशिश की है। छात्रों ने एसएचओ से एफआईआर पर भी नाखुशी जाहिर की और एफआईआर में एससी/एसटी एक्ट और गैरइरादतन हत्या के मामले को दर्ज करने को कहा, जहां एसएचओ ने मौखिक आश्वासन दिया कि जांच के दौरान हम इसको सही करेंगे।
हम देख सकते हैं कि एक मजदूर की मौत को शैक्षणिक संस्थान और पुलिस प्रशासन पहले से ही न्याय नहीं दिलाने का मन बना चुका है। अपराधी ही रक्षक बने हुए हैं। जिस सिक्योरिटी ऑफिसर की जिम्मेवारी थी रंजीत को समय से अस्पताल पहुंचाने और उसकी जान बचाने की, वह अफसर रोते-बिलखते परिवार वालों को पानी भी नहीं देना चाहता। वार्ता में भी उसने समय बर्बाद करने जैसे शब्दों का उपयोग किया।
आज जिस तरह से छात्रों और छात्र संगठन पछास ने मजदूर परिवार के साथ खड़े होकर न्याय दिलाने की कोशिश की, इसकी जरूरत हमें सभी जगह है। हर जगह युवा और संगठन आगे आएं और इस अंधी-बहरी हो चुकी प्रशासन के सामने मेहनतकश जनता के साथ डटकर खड़े हों और उनको अपने छात्र, युवा, मजदूर संगठनों के साथ जोड़ें और लड़ाई को मजबूत करें।
न्याय की लड़ाई एक-दो दिन की लड़ाई नहीं है। यह हर दिन, हर घंटे लड़नी पड़ती है और जब हम ऐसे लड़ेंगे, तभी रंजित के परिवार को न्याय मिल पाएगा।
(सुनील कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)